Friday, April 13, 2018

फलसफा तेरा...

  ऐ जिंदगी तेरा फलसफा....

_एक घडी खरीदकर_
_हाथ मे क्या बांध ली_

        _वक्त पीछे ही_
        _पड गया मेरे._

_सोचा था घर बना कर_
_बैठुंगा सुकून से,_

        _पर घर की जरूरतों ने_
        _मुसाफिर बना डाला मुझे._


_सुकून की बात मत कर_
_ऐ गालिब,_

        _बचपन वाला इतवार_
        _अब नहीं आता._


_जीवन की भाग दौड मे_
_क्यूँ वक्त के साथ रंगत खो जाती है ?_

        _हँसती-खेलती जिन्दगी भी_
        _आम हो जाती है._


_एक सवेरा था_
_जब हँसकर उठते थे हम,_

        _और आज कई बार बिना मुस्कुराये_
        _ही शाम हो जाती है._


_कितने दूर निकल गए_
_रिश्तों को निभाते निभाते,_

        _खुद को खो दिया हम ने_
        _अपनों को पाते पाते._


_लोग केहते है_
_हम मुस्कुराते बहुत है,_

        _और हम थक गए_
        _दर्द छुपाते छुपाते._


_खुश हूँ और सबको_
_खुश रखता हूँ,_

        _लापरवाह हूँ फिर भी_
        _सब की परवाह करता हूँ._



_मालूम है_
_कोई मोल नहीं है मेरा फिर भी_

        _कुछ अनमोल लोगों से_
        _रिश्ता रखता हूँ._

      चन्द्रा भगत्.

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