Friday, April 13, 2018

अनुभव मेरा..




    एक सुंदर कविता....

_ख्वाहिश नहीं मुझे_
_मशहूर होने की,

        _आप मुझे पेहचानते हो_
        _बस इतना ही काफी है._


_अच्छे ने अच्छा और_
_बुरे ने बुरा जाना मुझे,_

        _क्यों की जिसकी जितनी जरूरत थी_
        _उसने उतना ही पहचाना मुझे._


_जिन्दगी का फलसफा भी_
_कितना अजीब है,_

        _शामें कटती नहीं और_
        _साल गुजरते चले जा रहें है._


_एक अजीब सी_
_दौड है ये जिन्दगी,_

        _जीत जाओ तो कई_
        _अपने पीछे छूट जाते हैं और_

_हार जाओ तो_
_अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं._


_बैठ जाता हूँ_
_मिट्टी पे अकसर,_

        _क्योंकी मुझे अपनी_
        _औकात अच्छी लगती है._

_मैंने समंदर से_
_सीखा है जीने का सलीका,_

        _चुपचाप से बहना और_
        _अपनी मौज मे रेहना._


_ऐसा नहीं की मुझमें_
_कोई ऐब नहीं है,_

        _पर सच कहता हूँ_
        _मुझमें कोई फरेब नहीं है._


_जल जात है मेरे अंदाज से_
_मेरे दुश्मन,_

              _क्यों की एक मुद्दत से मैंने,
.... न मोहब्बत बदली
      और न दोस्त बदले हैं._

           चंद्रा भगत्









0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home